मधुमक्खियों द्वारा किये जाने वाले कार्य Work done by bees
1. सफाई :
कोष्ठकों की सफाई करना, जिससे वह निकल कर आती है तथा मौन गृह की सफाई करना।
2. परिचर्या
कोष्ठकों से निकलने के तीन दिन बाद श्रमिक मधुमक्खियाँ शिशुओं की परिचर्या का कार्य सँभाल लेती हैं। कम आयु की श्रमिक मधुमक्खियाँ तीन दिन पुराने शिशुओं को तथा 6-13 दिन की आयु वाली अनुभवी श्रमिक मधुमक्खियाँ तीन दिन से कम आयु वाले शिशुओं को खाना खिलाती है।
परिचारिका श्रमिक मधुमक्खियों के सिर में स्थित चुम्बकीय ग्रन्थियों (mandibular glands) के साथ ही उनकी अद्योग्रसनी ग्रन्थियों (hyppharyngeal glands) का भी विकास हो जाता है। इन दोनों ग्रंथियों के निकले पदार्थो से बने मिश्रण को बोल चाल की भाषा में Bu Milk अर्थात मधुमक्खी का दूध कहते है। रानी शिशु को खिलाया जाने वाला पदार्थ रॉयल जेली (Royal Jelly) भी इन्ही ग्रंथियों के स्रवण से बनता है।
३. छत्तों की रचना :
13-18 दिन के मध्य की श्रमिक मधुमक्खियाँ छत्तों की रचना, पुराने छत्तों की मरम्मत तथा कोष्ठको को मोम के ढक्कनों से बन्द करने का कार्य संभालती है इनकी अद्योग्रसनी ग्रंथियाँ समाप्त हो जाती है, परन्तु उदर के निचले भाग के अंतिम 4 खण्डों पर एक-एक जोड़ी मोम ग्रंथियाँ समाप्त हो जाती है, जिनसे मोम निकलता है। इन श्रमिकों को मोम उत्पादन करने के लिए शहद खाना पड़ता है। एक यूनिट मोम उत्पन्न करने के लिए 8.4 यूनिट मधु की आवश्यकता होती है।
मौन छत्ता : मौन छत्ता साधारणतया 3 प्रकार के होते है।
1. लैन्गसट्राट छत्ता :
यह छत्ता बड़ा होता है और 10 फ्रेम वाले प्रत्येक में होता है व सुपर चैम्बर होता है।
2. ज्यूलीकोट छत्ता :
यह छोटा छत्ता होता है और 7 फ्रेम का बना होता है। 3. आई०एस०आई० छत्ता : यह छोटा छत्ता होता है लेकिन फ्रेमों की संख्या 10 होती है।
होती है।
लैन्गसट्राट छत्ता
इटैलियन परिवार के लिए व शेष दोनो भारतीय मीन परिवार के लिए उपयुक्त
कोष्ठक : कोष्ठक 3 प्रकार के होते हैं।
जुड़ाव कोष्ठक : ऊपर के लकड़ी के फ्रेम से जुड़े रहते हैं। संग्रही कोष्ठक : इसमे शहद और पराग इकट्ठा की जाती है।
बूड कोष्ठक : नई मौनों को पालने के लिए होता है। यह तीन प्रकार का होता है।
श्रमिक कोष्ठक - यह कोष्ठक आकार में छोटा होता है तथा इसी कोष्ठक में श्रमिकों का
जन्म होता है।
ड्रोन कोष्ठक - ड्रोन या नरों के लिए होता है जो श्रमिक कोष्ठक से बड़ा होता रानी कोष्ठक - रानी का कोष्टक जो बड़ा और मूंगफली के आकार का होता है।
मधुमक्खी अपने छत्तों के बीच हमेशा 0.78 से०मी० या 8 मिमी० की दूरी रखती है। और यह अन्तर स्थायी होता है। ज्यादा या कम नहीं। इस खोज के आधार पर ही मधुमक्खी पालन की पेटिका का आविष्कार किया गया। यह खोज लोरेन्जो लैग्सट्राथ ने किया था ।
4. सुरक्षा :
कुछ श्रमिक मधुमक्खियों पर परिवार की सुरक्षा का दायित्व होता है। ऐसे समय जब भोजन की कमी होती है, ये मधुमक्खियाँ अधिक सक्रिय हो जाती है तथा इनकी संख्या काफी बढ़ जाती है, ये दूसरे वंश की मधुमक्खी को अपने घर में घुसने नही देती है। एक मधुमक्खी अपने जीवनकाल में केवल एक बार डंक मार सकती है, क्योंकि डंक मारने के बाद इनकी मृत्यु हो जाती है।
5. क्रीड़ा-उड़ान
जब श्रमिक मधुमक्खियाँ घर के अन्दर के कार्य करने की आयु पूरी करने वाली होती है तथा फूलों से रस, पराग या दोनों लाना प्रारम्भ करने वाली होती है तो, वे अपने घर से सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे के मध्य ढेर सारी श्रमिक मधुमक्खियाँ अपने घर से बाहर आकर मंडराने लगती है जिसे क्रीड़ा-उड़ान या प्रशिक्षण उड़ान कहते है। जब घर से फूलों या भोज्य-स्रोत तक आने जाने में निपुण हो जाती है,
तभी वो चारा लाने वाली श्रमिक का कार्य करती है। 6. वातानुकूलन : मधुमक्खियों का घर वातानुकूलित होता है, जिसके कारण अत्यंत विषम परिस्थितियों को छोड़कर उनके घर का तापमान 30-34° से० की सीमा में रहता है। तापमान का नियमन श्रमिक मधुमक्खियाँ करती हैं।
गर्मी के मौसम में ये प्रवेश द्वार के सामने व तलपट के ऊपर पंक्तिबद्ध खड़े होकर अपने पंख फड़फड़ाती है जिससे ताजी हवा घर के अन्दर जाती हैं। मधु-कोष्ठकों में जमा कच्चे मधु से नमी वाष्पित होकर तापमान कम करती है। अधिक गर्मी की अवस्था में मधुमक्खियाँ बाहर से पानी लाकर छत्ते के ऊपर फैलाती है,
जो श्रमिक मधुमक्खियों के पंख फड़फड़ाने से वाष्पित होकर तापमान कम करता है। सर्दी के मौसम में श्रमिक मधुमक्खियाँ गुच्छे बनाकर रहती हैं, जिससे इनके शरीर एक-दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं और इससे गर्मी उत्पन्न होती है। साथ ही शहद खाकर उपापचयी (metobolic temprature) ताप उत्पन्न करती है।
७. भोजन एकत्र करना :
कोष्ठकों से निकलने के 2-3 सप्ताह बाद श्रमिक मधुमक्खियाँ क्रीड़ा-उड़ान द्वारा छत्तों को पहचानना सीखकर विभिन्न प्रकार के फूलों से पुष्प रस या मकरन्द, पराग, रालाभ (Probolish) व पानी लाना प्रारम्भ कर देती हैं। कुछ श्रमिक केवल मकरन्द (nectare), कुछ केवल पराग तथा कुछ पराग व मकरन्द दोनों लाती है।

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