वंश वृद्धि honey bee Lineage increase
किसी मौन वंष का सशक्त या निर्बल होना माँ मौन (रानी) द्वारा संतानोत्पादन पर निर्भर करता है।
रानी मौन का गर्भाधान
रानी मौन के गर्भाधान का समय उसके जन्म के 3 से 14 दिन के अन्दर होता है। विशेष परिस्थितियों में इसके बाद भी गर्भाधान होते देखा गया है। नर मौन 12-13 दिन की आयु में रानी मौन को गर्भित करने योग्य हो जाती है। प्रतिकूल मौसम के कारण भी गर्भाधान में देरी हो सकती है।
संभोग की क्रिया हमेशा खुले आसमान में होती है। संभोग के पूर्व जब दिन में खूब खिली धूप होती है तब रानी मौन घर पहचान की उड़ान भरती है। वह कुछ दूर उड़कर बार-बार वापस मौन गृह में आ जाती है ऐसा वह इसलिए करती है कि, कहीं अपना घर भूल न जाये। जब रानी मौन को
अपने घर का सही ज्ञान हो जाता है तब एक दिन साफ मौसम को देखते हुए संभोग के लिए उड़ान भरती है। यह समय प्रायः 1 से 4 बजे के बीच होता है। जैसे ही रानी मौन बाहर निकलती है उसके पीछे कई नर मौन एक साथ पीछा कर लेते हैं और जो नर पहले सम्पर्क में आता है उसी के साथ संभोग हो जाता है। इस संभोग क्रिया में 4 से 50 मिनट तक का समय लग सकता है। इस प्रकार रानी मौन एक बार निषेचित होकर जीवन भर अण्डे दे सकती है।
रानी मौन में एक विकसित जनन तंत्र पाया जाता है जिसमें अंडाशय, अंडवाहिनी, जनन कोष्ठ तथा शुक्रग्राहिका आदि पायी जाती हैं। रानी मौन के अंडाणु अंडाशय की जनन कोशिकाओं में बनते हैं। पूर्ण विकसित होने के बाद अंडाणु अंडाशय में आ जाते हैं शुक्रग्राहिका में 40-70 लाख शुक्राणु आ सकते हैं तथा ये थोड़ी-थोड़ी मात्रा में अंडों को निषेचन के लिए छोड़ते हैं।
रानी मौन द्वारा अंडे देना
सफल निषेचन के 3-4 दिन बाद से माँ मौन, अंडे देना शुरू कर देती है। इसके पूर्व कमेरियों द्वारा मोम से कोठरियाँ बनाकर चमका दी जाती हैं। माँ मौन जब अण्डे देने निकलती है उस समय उसे घेरे हुए करीब एक दर्जन कमेरियाँ भी चलती हैं। ये कमेरियाँ रानी मौन की सेवा और समय-समय पर उसे भोजन देने के लिए साथ चलती हैं।
अण्डे देने के लिए रानी मौन अपना उदर कोठरी में डालकर सबसे निचले हिस्से में केवल एक अण्डा देती है और यह क्रिया बड़े ही क्रमबद्ध तरीके से होता है तथा एक भी कोष्ठक छूटता नहीं। अण्डे देते समय रानी मौन थोड़ी-थोड़ी देर बाद ठहर जाती है, इस समय उसे भोजन और आराम की आवश्यकता होती है। कमेरी मौन उसे तुरन्त भोजन उपलब्ध करवाती है, रानी मौन कभी-कभी एक दिन में अपने से अधिक भार तक अण्डे दे देती है।
रानी मधुमक्खी मैथुन के लिए 2-3 दिन तक कई उड़ाने भरती है। और कई नर से संभोग करती है। नर का स्पर्म (वीर्य) विशेष अंग स्पर्ममेथिया में इकट्ठा हो जाता है इसके बाद रानी कभी भी संभोग नही करती है। रानी सामान्य परिस्थिति में 800-1200 अण्डे प्रतिदिन देती है। लेकिन प्रतिकूल स्थिति में 1300-1500 अण्डे प्रतिदिन देती है। नर अनिषेचित अण्डों से पैदा होते है और हैपलायड क्रोमोसोम के वाहक होते हैं।
देती हैं। लेकिन उनकी माप में अंतर होता है। कमेरी कोठरियाँ, नर कोठरियों से नाप में छोटी होती हैं। अधिकांश नर कोठरियाँ छत्ते के निचले हिस्से में व कमेरी कोठरियाँ मध्य भाग में होती हैं।
रानी मौन की कोठरियाँ अधिकाँश छत्ते के निचले भाग में गाय के थन के समान लटकी रहती हैं। लेकिन कभी कभी मौने इन्हें छत्ते के मध्य व अगल-बगल में भी बना देती हैं। ये कोठरियाँ केवल माँ मौन को पैदा करने के लिए उपयोगी होती है।
मौन का जीवन चक्र
मौन के जीवन चक्र की 4 अवस्थायें होती हैं जिसमें अंडा, इल्ली, प्यूपा तथा वयस्क।
अंडा
रानी का ज्यादा उम्र एवं अण्डा देने की कम क्षमता होने पर रानी का एक या दो सेल बनता है। यह रानी के खराबी से भी बनता है इसलिये पुरानी रानी को बदल देते हैं। यदि किसी कारणवश रानी मक्खी मर जाती है, तब उस स्थिति में कमेरी मौन लारवा को रॉयल जेली खिलाकर रानी को जन्म देती है।
रानी मौन दो तरह के अंडे देती हैं जिसमें निषेचित तथा अनिषेचित हैं। अनिशेचित अंडों से नर मौन तथा निषेचित अंडों से कमेरी तथा रानी मौन बनती हैं। लेकिन सभी अंडे छोटे, पतले तथा सफेद रंग के होते हैं। यह बाहर से एक कवच से ढका होता है जिसे जरायु या छिलका कहते हैं।
इल्ली (लारवा)- जब रानी मौन अंडा देती है तो उसके कुछ घंटे के बाद ही अंडे में गति प्रारम्भ हो जाती है। तीन दिन के बाद जब अंडे से इल्ली जन्म लेने ही वाली होती है, यह छिलका अति पारदर्शक बन जाता है। जब इल्ली जन्म लेने के लगभग होती है तो उसकी स्थिति में बदलाव होने लगता है।
सेवक मौनें जो समय-समय पर कोठरी में सिर डालकर देखती रहती हैं, इस काल में इल्ली के खाने के लिए मधु अवलेह की बूंद उसके पास रख दी जाती है। इस बूँद के अंडे से टकराते ही अंडा फूट जाता है और इल्ली बाहर निकल आती है। लगभग 3 दिन तक सभी इल्लियों को मधु अवलेह दिया जाता है।
उसके बाद रानी मौन के अलावा अन्य इल्लियों को दूसरा रूखा भोजन, जो शहद और पराग का मिश्रण करके दिया जाता है। इसे मौनी रोटी कहते हैं। इल्ली की अवस्था बढ़ने के साथ ही साथ उसके भोजन की मात्रा में वृद्धि कर दी जाती है, यहाँ तक की इल्ली के चारो ओर भोजन भर दिया जाता है।
प्यूपा- इस काल में मौने कोठरी के सिरे को पूर्णतयः बंद कर देती है। इल्ली उसी बंद अवस्था में ही विकसित होने लगती है। उसके बाहर से एक रेशमी खोल बुन दिया जाता है। जिसे 'कोकून' कहते हैं। उसकी आकृति में भी धीरे-धीरे बदलाव आने लगता है।
मुँह, आँखें, पैर व पंख बारी-बारी से बनकर, उसे पूर्ण मौन की आकृति प्रदान कर देते हैं। इस प्रकार एक दिन वह चुपके से कोठरी का ढक्कन काटकर बाहर निकल आती है और मौनों के भीड़ में मिल जाती है।
कमेरी, नर तथा रानी मौन की कोठरियाँ
मौन के छत्ते को ध्यान से देखने पर तीन तरह की कोठरियाँ दिखाई देती हैं। छत्ते का अधिकांश भाग कमेरी और नर मौन की कोठरियों से ही भरा होता है। तीनों तरह की कोठरियो के आकार में अंतर पाया जाता है। कमेरी और नर कोठरियाँ देखने में एक समान षटभुजाकार दिखाई
बकफुट काल- प्रत्येक वर्ष प्रत्येक स्थान पर मौसम के कुछ आगे पीछे, जैसे फरवरी-मार्च के लगभग ठंडे स्थानों में तथा जनवरी-फरवरी के लगभग ठंडे स्थानों में बकछुट काल होता है। इस समय वे अपने पुराने वंश को बाँटकर समूहों में नये घर बसाने के लिए निकल पड़ते हैं। प्रत्येक समूह जो पुराने वंश से अलग होकर नया घर बसाने को निकल पड़ता है अपने साथ एक रानी मौन को भी अवश्य ले जाता है।
क्योंकि बिना रानी मौन के मौन वंश का कोई मतलब नहीं होता है, इसीलिए इस काल में रानी मौन बनाने की होड़ सी लग जाती है। प्रत्येक शक्तिशाली मौन वंश में दर्जनों तक रानी मौन एक साथ बनने लग जाती हैं। वंश की शक्ति के अनुसार जितने भी विभाजन होते हैं उतनी ही रानी मौने प्रत्येक में एक-एक के हिसाब से उनके साथ निकल कर शामिल हो जाती है।
वृद्धोद्धार काल- रानी मौन, वंश के लिए दो से ढाई वर्ष तक ही उपयोगी रहती है। इसके बाद उसमें बुढ़ापा आ जाता है। वह कमेरी के अंडे देने की शक्ति में कमी कर देती है। इसीलिए जब मौनें देखती हैं कि उनकी रानी मौन अब वंश की उचित सेवा करने के योग्य नहीं रह गयी है तो वे उसको बदलने की तैयारी में लग जाती है। इसी को वृद्धोद्वार काल कहते हैं।
रानी मौन का जन्म 3 स्थितियों में होता है।
• बकछुट के समय (विभाजन के समय)
• सुपर स्युडर (वृद्धोद्वार काल)
आपातकाल में
बकरी के समय (विभाजॅन के समय) जब बस्ती में परिवार के सदस्यों की संख्या में अण्डा ज्यादा होने के बाद शिशु खण्ड में अंडा तथा मधु से भर जाता है तब जगह की कमी हो जाती है उस समय रानी अपना अण्डा देकर घर छोड़ती है।
सुपर स्युडर (वष्डोद्वार काल नी का ज्यादा उम्र, अण्डा देने की कम क्षमता होने पर रानी का एक या दो सेल बनता है। यह रानी खराबी से भी बनता है इसलिए पुरानी रानी को बदल देते हैं।
आपातकाल में अचानक कभी किसी कारणवश रानी मक्खी मर जाती है तब ऐसी स्थिति में कमेरी मक्खी लारवा को रॉयल जेली खिलाकर रानी को जन्म देती है।
रानी मौन को अंडे से पूर्ण रानी मौन बनने तक 15-16 दिन का समय लग जाता है। 3 दिन तक उसे अंडे की अवस्था, 5-6 दिन तक इल्ली की अवस्था में तथा लगभग 7 दिन तक प्यूपा की अवस्था में रहना पड़ता है।
मौने किसी कर्मठ के अंडे या नवजात कीट को रानी मौन बनाये जाने हेतु चुन लेती है और उसे मधु अवलेह खिलाना प्रारम्भ कर देती है। उसके चारो ओर किलेनुमा दीवार खड़ी करना शुरू कर देती हैं। उसी को रानी मौन कोठरी कहते हैं रानी मौन को जन्म देने से पहले अपना पूरा समय उसी कोठरी में बिताना पड़ता है।
इल्ली के बढ़ने के साथ ही साथ इस कोठरी की दीवारों को भी ऊपर उठाया जाने लगता है। इस दशा में इस कोठरी का मुँह खुला रखा जाता है।
ज्यों ही इल्ली अवस्था समाप्त होने को होती है। सेवक मौने कोठरी के सिरे को बन्द कर देती है तत्पश्चात रानी मौन बनकर ही रानी मौन बाहर निकलती है। कोठरी का सिरा पहले कुछ सफेदी लिये होता है ज्यों ही इसके भीतर रानी मौन पूर्णता को प्राप्त करती जाती है इसका रंग बदलने लगता है और यह एकदम से भूरे रंग में बदल जाती है। इसे पकी हुई रानी मौन कोठरी कहते हैं। जब रानी मौन लगभग पूर्णता को पहुँच जाती है
तो बाहर की मौनें कोठरी के सिरे को चाट-चाटकर इतना पतला कर देती है कि वह पारदर्शक बन जाता है। जिस कोठरी से रानी मौन सुरक्षित जन्म ले लेती है, उस कोठरी के सिरे पर का ढक्कन ठीक कब्जेदार ढक्कन की ही भाँति खुलकर उस पर ही लटका रह जाता है।
नर मौन का जन्म- नर शिशु के उत्पादन के लिए मौने कुछ बड़ी नाप की कोठरियों का प्रयोग करती हैं। ये कोठरियाँ अधिकांश छत्ते के निचले व अगल बगल के भाग में बनी होती हैं। आवश्यकतानुसार मौनें नर कोठरियों के सिरों को तंग करके उन्हें कमेरी के जन्म के लायक बना लेती हैं और रानी मौन भी उनमें कमेरी के अंडे दे देती हैं। कभी-कभी कमेरी कोठरियों में भी नर मौन के अंडे रानी मौन द्वारा दे दिये जाते हैं।
भोजन की मात्रा का भी नर मौन के जन्म में महत्व रहता यदि वंश के पास खाने की कमी हो, और बाहर से भी उसकी प्राप्ति न हो रही हो तो नर मौनों का जन्म भी रोक दिया जाता है। यहाँ तक कि भीतर के नर मौन धक्का देकर बाहर निकाल दिये जाते हैं और उसी मौन वंश में जब बाहर से भोजन की प्राप्ति होने लगती है तो नर मौन फिर पैदा किये जाने लगते हैं।
नर मौन लगभग 3 दिन अंडे की अवस्था में, 7 दिन इल्ली की अवस्था में तथा १४ दिन तक प्यूपा की अवस्था में रहकर 24 दिन में पूर्णता प्राप्त कर जन्म पाता है।
कमेरी मौन का जन्म- यह मौन लगभग 3 दिन अंडे की अवस्था में, 4-5 दिन इल्ली की अवस्था में तथा 11-12 दिन तक प्यूपा की अवस्था में रहकर पूर्णता प्राप्त करती है। पूर्णता तक पहुँचने के लिए इसे 19 से 22 दिन तक लग जाते हैं। शिशुपालन तथा विकास मौन वंश में उपलब्ध भोजन, तापमान तथा वंश की शक्ति और रानी मौन की अवस्था पर निर्भर करता है।
मधुमक्खी पालन से पहले तथ्यों की जानकारी
- मौन पालन को सर्वप्रथम जहाँ मौन पालन करना हो, मौन और मनुष्य के सम्बन्धों के बारे में परिचित होना चाहिए।
- नये मौन पालको को अनुभवी मौन पालको के साथ आमतौर पर व्यवसाय शुरू करना चाहिए।
- नये मौन पालक को 2-3 मौन बाक्स से व्यवसाय शुरू करना चाहिए जिससे व्यवसाय वृद्धि
- से संतुष्ट को सके।
- प्रशिक्षण और ज्ञान मौन पालन पर कर लेना चाहिए। क्षेत्रीय फसलों, फूलों, फलो और वनस्पतियों का ज्ञान होना चाहिए।
- पर्याप्त मात्रा में क्षेत्रीय वनस्पतियों को होना चाहिए।
- मौन की एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का ज्ञान होना चाहिए।
- स्थल चुनाव अच्छी तरह से करना चाहिए। स्थल सूखा नही होना चाहिए।
- उच्च सापेक्ष आर्द्रता (उमस, गर्मी) नहीं होना चाहिए अन्यथा मौन उड़ान व शहद पकने को प्रभावित करता है।
- स्वच्छ पानी की व्यवस्था होनी चाहिए।
- मौन बाक्स को छायादार जगह में रखना चाहिए।
- जिन वृक्षों से पराग और शहद मौनों को मिलता है उनका स्थल के पास अधिकता होनी चाहिए।
- मौनों की स्थान परिवर्तन 10 प्रतिशत फूल की अवस्था में कर देना चाहिए।
- प्रति हे० इटैलियन मौन का 3 बाक्स व भारतीय मौन का 5 बाक्स के हिसाब से रखना चाहिए। बाक्स में पर्याप्त मात्रा में पराग और शहद रखने की जगह होनी चाहिए।
- मौन का डंक मारना मौन पालन में आम बात है।
- अनुभवी मौन पालकों से उन्नत मौन पालक बनने का अवसर प्राप्त होता है।

0 Comments