मौन परिवार एवं श्रम विभाजन
मौन एक सामाजिक प्राणी है। एक मौन वंश या परिवार उस इकाई को कहा जाता है। जिसमें
नर व रानी मौन सहित सभी कमेरी मौने एक साथ रहती हैं। एक मौन वंश में तीन तरह की मौने
होती है जिसमें रानी, कमेरी तथा नर हैं। एक मौन वंश में कमेरियों की संख्या लगभग 10,000 से
30,000 होती है, जबकि नर 200 से 500 तक ही होते हैं।
रानी मौन- मौन परिवार में रानी ही पूर्ण विकसित मादा है। यह सारे सदस्यों की माँ होती
है। एक परिवार में एक ही रानी होती है, एक से अधिक रानी मौन होने पर रानी ज्यादा समय तक
छत्ते में नहीं रह पाती।
रानी मौन की पहचान-
रानी, कमेरी तथा नर की अपेक्षा बड़ी होती है। इसका भार 140
से 200 मिग्रा० तथा रंग सुनहरा होता है, किन्तु गर्भवती होने पर चमकीला काला हो जाता है। रानी
का उदर अधिक लम्बा एवं चौड़ा तथा त्रिभुजाकार
होता है। उदर की लम्बाई के कारण, पंख कमेरी
मौन की अपेक्षा छोटे दिखाई देते हैं। जीभ कम
विकसित होती है तथा ऑखें नरों की अपेक्षा छोटी
होती है। रानी मधुमक्खी श्रमिक व नर दोनों से ही
लम्बी होती है। रानी का वक्ष पतला तथा उदर
क्रमशः धीरे-धीरे पतला होकर अन्त में नुकीला हो
जाता है। उदर के नुकीले सिरे पर एक डंक होता
है, जिसका उपयोग वह विरोधी रानी को मारने में
करती है।
पूरे परिवार में केवल एक ही रानी होती है, जो समस्त परिवार की माँ होती है। छत्तों में यह
सदैव घूमती रहती है, तथा उनमें बने प्रत्येक कोष्ठक का निरीक्षण करती रहती है और वह एक कोष्ठक
में एक अंडा देती है। रानी अकेले अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकती है, क्योंकि वह स्वंय
न तो खा सकती है और न ही अपनी सफाई कर सकती है। इन कार्यों के लिए रानी सदैव श्रमिक
मधुमक्खियों पर निर्भर रहती है, जो इसे घेरे रहती है।
रानी मधुमक्खी के मुख्यतः दो कार्य है-
प्रजनन एवं रानी पदार्थ का श्रवण।
रानी मौन की उत्पत्ति व पालन पोषण
रानी मौन जनन क्षमता युक्त अण्डे से उत्पन्न होती है। इसका पालन पोषण छत्तों के निचले
भागों में बनाये गये विशेष प्रकार के लम्बे अँगुली के आकार के कोष्ठों में होता है। आपात कालीन
स्थिति में जब रानी मर जाये या अण्डे देना बन्द कर दे तो, कमेरियाँ कमेरी कोष्ठों में डाले गये अण्डों
से भी रानी बना लेती हैं। रानी मौन आकार में बड़ी होती है तथा उसके अण्डाशय व प्रजनन अंग
पूर्णरूप से विकसित होते हैं, जिससे अण्डे दे सकती है।
रानी मौन अपने प्रकोष्ठ से बाहर निकलकर छत्तों मे घूमती है। 2-3 दिन तक यह घर के
अन्दर ही रहती है। फिर बाहर उड़कर आसपास की जगह को पहचान लेती है। तीन दिन के बाद यह
संभोग के लिये उड़ान भरती है। इस उड़ान में कुछ कमेरियाँ भी रानी के साथ रहती है। अनेक नर
रानी का पीछा करते हैं, किन्तु उनमें से केवल एक ही नर रानी को गर्भित करने में सफल हो पाता
है। गर्भाधान की प्रक्रिया समाप्त होने पर नर लिंग टूटकर रानी की योनि में फंसा रहता है और नर
मरकर नीचे गिर पड़ता है। रानी छत्ते में वापस आ जाती है तथा उसके योनि में चिपके नर लिंग
के अवशेष को कमेरियाँ साफ करती है। संभोग उड़ान, प्रायः दोपहर के बाद ही होता है।
अनुकूल
मौसम में 5-10 दिनों में रानी गर्भित हो जाती है जबकि विपरीत मौसम में 20-25 दिन का समय
लग सकता है। गर्मित होने के बाद रानी 48 से 72 घंटे के अन्दर अण्डे देना शुरू कर देती है। राना
भारतीय मधुमक्खी की रानी एक से डेढ़ वर्ष तक अच्छी प्रकार अण्डे देती हैं, तथा उसके बाद अण्डे
रानी का मुख्य कार्य अण्डे देना है।
इसकी अण्डे देने की क्षमता उम्र के साथ-साथ पराग व
मकरंद की प्राप्ति और छत्ते में उपलब्ध स्थान पर भी निर्भर करती है। यूरोपियन जाति की रानी 1500
से 2000 और भारतीय (इंडिका) रानी मौन औसतन 1000 अण्डे प्रतिदिन देती है। पराग व मकरंद
देने की क्षमता कम हो जाती है।
के अभाव में ये अण्डे देना बिल्कुल बन्द कर देती है।
कमेरी मधुमक्खी-
मौन वंश में कमेरियों की संख्या सबसे अधिक होती है। ये अविकसित
मादा हैं जिनका सिर लम्बा त्रिभुजाकार और उदर भी त्रिभुजाकार एवं धारीदार होता है। उदर के अंतिम
भाग में जहरीला डंक होता है तथा सिर के दोनों ओर यौगिक (कम्पाउण्ड) आँखें और ऊपरी भाग
में साधारण ऑखे होती हैं। इनकी पिछली दो टाँगों में पराग एकत्र करने के लिए टोकरी होती है तथा ये
अण्डे देने योग्य नहीं होती हैं।
लेकिन रानी की अनुपस्थिति में अण्डे देती हैं जिनसे केवल नर उत्पन्न
होते हैं। मौन वंश का सारा कार्यभार कमेरियों पर रहता है। ये शिशुओं के पालन पोषण, देखरेख,
छत्तों की सफाई एवं सुरक्षा के साथ-साथ पराग तथा मकरंद भी एकत्र करती हैं। ये रानी की सेवा
करती हैं और उसकी गतिविधियों पर भी नियंत्रण रखती हैं। रानी के अंडे न देने पर ये नयी रानी
उत्पन्न कर लेती हैं।
मधुमक्खी वंश में रानी व नर मधुमक्खियों को छोड़कर शेष सभी श्रमिक मधुमक्खियाँ होती
है। सामान्य वंश में 20,000-30,000 श्रमिक मधुमक्खियाँ होती है। श्रमिक मधुमक्खियाँ रानी व नर
से छोटी होती है तथा इनका शरीर बालों से ढ़का रहता है, अपने जीवन के सामान्य छ: सप्ताह के
काल में ये पहले तीन सप्ताह घर के अन्दर तथा शेष तीन सप्ताह घर के बाहर काम करने में व्यतीत
करती है।
नर मधुमक्खी-
असंसेचित अंडों से नर पैदा होते हैं। नर कोष्ठ, कमेरी कोष्ठों से थोड़े बड़े
होती है तथा जीम अविकसित होती है। इसका
होते हैं। नर का उदर काला तथा आयताकार होता है। नर की आँखें बड़ी तथा सिर के ऊपर सटी
कार्य केवल रानी को गर्भित करना है।
दिन में प्रौढ़ होता है तभी यह संभोग करने योग्य
होता है। एक नर की आयु प्रायः 50 दिन होती है।
मधुमक्खी के नर को ड्रोन कहते है। आकार
में रानी से छोटे, परन्तु श्रमिक से बड़ी नर
10-15
मधुमक्खियाँ होती है। ये वर्ष भर उपलब्ध नहीं होते
हैं केवल मधुनाव के दौरान मधुमक्खियों के प्रजनन मौन परिवार एवं श्रम विभाजन
।
काल में जब नई रानियों का जन्म होता है व नये नये परिवार बसते है, तापी अनिषदित अंडी मे
इनका जन्म होता है। इनका कार्य मैथुन उड़ान के समय रानी के साथ रति क्रीडा करना है। इस कार्य
के अतिरिक्त ये कोई कार्य नहीं करते हैं।
मधु स्राव काल की समाप्ति अर्थात शीतकाल तथा वर्षाकाल के प्रारम्भ में श्रमिक मधुमविन्द्रयाँ
नरों को छत्तों के बाहर धकेल देती है तथा घर के अन्दर वापस नहीं आने देती, परिणाम स्वस्थय ये
मर जाते है।
मौन वंश में कमेरी मौनों का महत्व-
किसी भी मौन वंश में कमेरी मीने सबसे महत्वपूर्ण होती हैं। मौन वंश का पूरा विकास कार्य
जैसे शहद और मोम उत्पादन, बच्चों की देखभाल तथा सुरक्षा आदि की सम्पूर्ण जिम्मेदारी कमेरी मौनों
की होती है। ये अपने जन्म के तुरन्त बाद ही कार्य में जुट जाती हैं। छन्तों के कार्यों से छुट्टी पाने
पर मौन बाहर के कार्यों जैसे अमृत लाना, पानी लाना व मोमी गोंद लाने में जुट जाती हैं।
शिशु का पालन पोषण-
छत्तों की सही माप की कोठरियों को बनाने का कार्य कमेरी मौन का है। कोठरियों को अच्छी
तरह साफ करके चमका दिया जाता है। इसके बाद रानी मौन, उन कोटरियों में अंडे देती है। इन
अंडों से मौन बनने तक का सारा कार्य कमेरियों पर रहता है।
मौन गृह के मध्यवर्ती छत्तों का तापमान सबसे अधिक होता है, यहाँ शिशु पालन का काम
बराबर चलता रहता है। यहाँ जन्म लेने वाली मौनों को पैदा होने में समय भी कम लगता है। जन्म
के बाद कमेरी मौने अपने आरम्भिक दिनों में छत्ते में ही रहकर शिशुओं की देखभाल का काम करती
हैं। इस समय में कमेरी मौने सेवक मौन कहलाती हैं।
कमेरी मौन जब तीन दिन की हो जाती है तब
से सेवा का कार्य प्रारम्भ कर देती हैं। पहले वह पुराने कीटों की परिचर्या का कार्य करती हैं। जब
वह 5-6 दिन की हो जाती है तो, उसमें अवलेह ग्रन्थियाँ प्रकट हो जाती हैं और वह छोटे व नये
कीटों की देखभाल भी आरम्भ कर देती हैं। लगभग 13 दिन की अवस्था तक इस तरह के कार्यो
को करती रहती हैं। इसलिए इस अवस्था में उन्हें सेवक यानि दाई मौन कह कर सम्बोधित किया
जाता है।
मोम उत्पादन एवं छत्ते का निर्माण-
कमेरी मौन द्वारा मोम उत्पादन और छत्ता निर्माण का कार्य किया जाता है। ये छत्ते ही पूरे
मौन वंश का आधार होते हैं। क्योंकि इन्हीं में शहद का संग्रह होता है। मोम केवल कमेरी मौन द्वारा
ही पैदा किया जा सकता है क्योंकि मोम कमेरी मौन के उदर में स्थित मोमग्रन्थि से ही निकलता है। ये
ग्रन्थियाँ माँ मौन और नर मौन में नहीं होती है।
कमेरी चारा मौन के रूप में
कमेरी मथुमक्खी इक्कीस दिन के बाद चारा मथुममग्री बनकर बाहरी कार्यों में लग जाती हैं
और पराग, मकरंद व पानी एकत्रित करती हैं। कुछ मथुमक्खियाँ खोजी के स्था में भोजन की तालाश
में निकलती हैं तथा स्रोत प्राप्त होते ही, भोजन संग्रह करना आरम्भ कर देती हैं। ये छत्ते में वापस
लौटकर विशेष नृत्य द्वारा अन्य चारा कमेरियों को मौत की जानकारी देती हैं
जिसे प्राप्त करते ही
संग्रह करने वाली कमेरियाँ इच्छित स्थान की और उड़ जाती है। जाड़ों में जब तापमान कम होता है
तो मधुमक्खियाँ तब तक सक्रिय नहीं होती जब तक सूर्य की गर्मी से तापमान न बढ जाये। प्रकाश
का प्रभाव भी मथुमक्खी की सक्रियता पर पड़ता है। गर्मियों में मधुमदनी उषाकाल के बाद ही सूर्य
की पहली किरण पड़ने पर अपने छत्ते से पराग व मकरंद लाने निकल पड़ती हैं।
मथुमक्खी फूलों में
उसी समय जाती है जब उनमें पराग या मकरंद उपलब्ध हो। यह अपने भार से 50-70 प्रतिशत
मकरंद का बोझ लाती है। कमेरी तब तक भोजन लाने नहीं निकलती जब तक वायुमण्डल का तापमान
15° सेल्सियस से ऊपर न हो जाये। कमेरी एक प्रकार के फूलों में बार-बार तब तक जाती हैं जब
तक उन्हें भोजन मिलता रहता है।
चारा मथुमक्खी किसी फूल पर पराग के लिए औसतन 9 सेकण्ड
और मकरंद जमा करने के लिए 7 सेकण्ड तथा दोनो को एकत्र करने में 10-12 सेकण्ड लगाती
है। एक चारा मथुमक्खी औसतन 8 मिग्रा० पराग लाती है, जिसको जमा करने में उसको औसतन
20-25 मिनट लगते हैं।

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