मथुमक्खी की शरीर रचना madhumakkhee kee shareer rachana

 मथुमक्खी की शरीर रचना

मधुमक्खी आधोपोडा समुदाय का एक कीट है। इसका शरीर घने बालों से ढका रहता

शरीर की बाहरी त्वचा काइटिन की बनी होती है। काइटिन की मोटाई अंगों के अनुसार

बदलती रहती है। काइटिन कहीं पर कड़ी तो कही लचीली होती है। काइटिन मधुमक्खी का

एक तरह का कंकाल ही है। मधुमक्खी का शरीर अन्य कीटों की भौति सिर, वक्ष तथा उदर

तीन भागों में विभाजित होता है।


सिर-


सिर शरीर का अलग भाग है जिसमें मुखाँग आँखें और श्रृंगिकाएं (एंटिना)

होती है।


ऑख-


मौन की आँखें दो प्रकार की होती हैं साधारण आँखें और संयुक्त आँखें।

साधारण आँखें तीन होती हैं जो माँ मौन व कर्मठ में सिर के ऊपरी भाग में तथा नर मौन

के कुछ सामने की ओर त्रिभुजाकार रहती है। संयुक्त आँखें दो होती हैं जो सिर के दोनो

तरफ स्थित होती है। नर मौन में आँखें सबसे बड़ी तथा कर्मठ में सबसे छोटी होती है।


मुख से सम्बन्धित अंग-


मौन के मुख में ऊपरी होंठ, मुँह तथा ऊपरी होंठ के

अगल-बगल दो जबड़े तथा इन्हीं जबड़ों के नीचे भीतर की ओर मौन की जीभ होती है।

मौन के जबड़े ऊपर-नीचे न चलकर दायें-बायें चलता है। मौन की संरचना में जीभ का

विशेष महत्व है, क्योंकि जीभ के सहारे ही वह मकरंद एकत्र करती है। जब मौन को पर्याप्त

मात्रा में कोई गाढ़ा तरल पदार्थ मिलता है


तो इसे लेने के लिए वह निचले होंठ व जबड़ों

को मुख्य जीभ से मिलाकर नलिका सी बना लेती है और इस तरह यह पदार्थ को चूस

लेती है। जब मौनों को फूलों की तली से मकरंद प्राप्त करना होता है तो यह मुख्य जीभ

और सहायक जीभ का सहारा लेती है। मुख्य जीभ सूंडनुमा होती है जिसका अग्रभाग

चम्मचदार बना होता है मुख्य जीभ की जड़ के पास दोनों तरफ दो सहायक जीभ

होती है।


2) वक्ष-


यह शरीर के बीच का बड़ा भाग है। वक्ष के अगले सिरे पर सिर तथा

पिछले सिरे पर उदर होता है। वक्ष को तीन खण्डों में विभाजित कर सकते हैं। सिर से लगा

अग्रिम वक्ष, मध्य वक्ष तथा पश्च वक्षा बक्ष के अग्रिम तथा मध्य भाग में पंखों का क्रमशः

पहला व दूसरा जोड़ा पंख तथा पश्च वक्ष में तीसरा जोड़ा तथा पंडों का दुसरा जोड़ा जुड़ा

होता है।


पैर-


मधुमक्खियों में तीन जोड़ी पैर होते हैं। ये तीनों एक समान नहीं होते हैं जो

अगला पैर, मध्य पैर तथा पश्च पैर कहा जाता है। इनके कार्य भी अलग-अलग हैं। अग्रिम

पैर पर स्पशेन्द्रियों को साफ करने के लिए अर्थ चन्द्राकार दाँतेदार कंदा बना होता है। इन

पैरों को सिर के आगे बढ़ाकर इसके कये से स्पर्शेन्द्रियों की सप्लाई करती हैं। मध्य पैरों

में एक दूसरे प्रकार का काँटा होता है, जो मौन की पराग टोकरी से पराग उतारने में मदद

करता है। पीछे के पैरो के बीच में गड्ढेनुमा भाग होता है, जो पराग टोकरी कहलाती है

और इससे पराग इकट्ठा करने का कार्य करती हैं।


पंख-


मौन के शरीर में दो जोड़ी पंख पाये जाते हैं जिन्हे क्रमशः अगला जोड़ा तथा

पिछला जोड़ा कहा जाता है। पंख का अगला जोड़ा, पिछले जोड़े की अपेक्षा थोड़ा बड़ा

होता है।


उदर-


मौन का उदर, एक पतली नलिका द्वारा उसके वक्ष से जुड़ा रहता है।

कीटावस्था में मौन का उदर 10 चक्राकार खण्डों में विभाजित रहता है। लेकिन कुछ समय

बाद एक खण्ड वक्ष में समाहित हो जाता है। और उदर में केवल 9 खण्ड शेष रह जाते

हैं। जब मौन पूर्ण वयस्कता को प्राप्त कर लेती है तब अन्तिम तीन खण्ड अदृश हो जाते

हैं, इस प्रकार केवल 6 खण्ड ही दिखाई देते हैं। ये अन्तिम तीन खण्ड सातवें खण्ड में

समाहित हो जाते हैं इस प्रकार माँ, मौन व कर्मठ में 6 खण्ड तथा नर मौन में 7 खण्ड

दिखाई देते हैं।


रक्त संचार-


पीठ के बीचों बीच एक लम्बी नलिका, सिर से उदर के छठे खण्ड

तक चली जाती है। इस नलिका के उदर स्थित भाग को मौन का हृदय तथा सीने में स्थित

भाग को धमनी कहा जाता है। हृदय 5 स्थानों पर खुला रहता है जहाँ से उसमें रक्त प्रवेश

करता है। यह रक्त पीछे से सिर तक पहुंच जाता है। इसको पीछे की ओर बहने से रोकने

के साधन हृदय में होते हैं। धमनी सिर में खुल जाती है और सिर में समस्त अवयवों में

रक्त पहुँचाकर, शरीर के निचले भाग में पहुँचकर उसमें स्थित दूसरी नलिका से उदर तक

ले जाती है और रक्त को पीछे बहाकर समस्त अवयवों का वितरण करती है। इसके बाद

इसका बहाव फिर ऊपर की ओर होकर हृदय तक पहुंचता है। इसी प्रकार सारे शरीर में ।

रक्त का संचरण होता है। मौन का रक्त हमारी तरह लाल नहीं, पर हल्के पीले रंग का होता है।


श्वसन क्रिया-


मौन में इस कार्य के लिए हवा की थैलियाँ बनी होती हैं, जो उदर

व सीने पर बने छोटे-छोटे छिद्रों से जुड़ी रहती है। ये छिद्र केवल दस जोड़े होते हैं। तीन

जोड़े वक्ष में तथा सात जोड़े उदर में। सिर में ये छिद्र नहीं होते। इन छिद्रों को वायु नलिका

या वायु छिद्र कहा जाता है। मौन अपने उदर आगे-पीछे ऊपर-नीचे खींच कर वायु को

बाहर से प्राप्त करती है और उसे भीतर स्थित वायु थैलियों में भरकर सारे शरीर में पहुँचा

देती है। शरीर को रक्त द्वारा ऑक्सीजन पहुँचाने का काम मौन में नहीं होता है।


जननेन्द्रियाँ-


केवल नर व रानी मौन की जननेन्द्रियाँ ही विकसित होती हैं। कमेरी

मौने (कर्मठ) यद्यपि मादा अवश्य होती है, लेकिन इसकी जननेन्द्रियाँ विकसित नहीं होती।

नर जननांग की बनावट कुछ ऐसी होती है कि वह जब मैथुन के समय रानी मौन के विपरीत

दिशा में जोर लगाता है तो नर जननांग खिंचकर बाहर चला आता है। जिससे बाद में नर

की मृत्यु हो जाती है।



डंक-


डंक केवल रानी मौन और कमेरी मौन में ही पाया जाता है। रानी मौन के

डंक में दाँतेदार काँटे कमेरी की अपेक्षा छोटे होते हैं। यह अपने डंक का प्रयोग केवल

प्रतिद्वन्दी रानी को मारने में ही करती है। कमेरी मौन का डंक आरीनुमा होता है, जिसके

दाँते उल्टी दिशा में बने होने के कारण डंक मारने पर डंक सरलता से नहीं निकल पाता।


मौन जब डंक को खीचने लगती है तो यह विषग्रन्थि सहित बाहर निकल आती है। डंक

माँस में गड़ा ही रह जाता है और मौन उड़ जाती है। लेकिन कुछ समय बाद यह डंक मारने

वाली मौन स्वयं मर जाती है।



लार ग्रन्थियाँ-


जीभ की जड़ पर ये ग्रन्थियाँ स्थित रहती है। इनमें लार के समान

पतला पदार्थ उत्पन्न होता है। जिसका उपयोग मौन अमृत व पराग को पतला करने में

करती हैं।


अवलेह ग्रन्थियाँ-


ये ग्रन्थियाँ मौन के सिर के ऊपरी भाग में होती है। कर्मठ मौन

में ये पूर्ण विकसित होती है। नर और रानी मौन में ये अविकसित रहती है। इन ग्रन्थियों

से दूध की तरह का पतला पदार्थ निकलता है। जिसे मधु अवलेह या रॉयल जेली कहते

हैं। रानी मौन द्वारा दिये गये गर्भित अण्डों से निकली इल्ली (लार्वा) को रॉयल जेली

खिलाकर कमेरी मौनें रानी मौन बनाती है।


उदर की ग्रन्थियों-


ये ग्रन्थियाँ डंक की जड़ में होती हैं जिसमें विष का निर्माण

होता है। मौन द्वारा डंक मारने पर डंक नली द्वारा यह विष शिकार के शरीर में पहुंचा दिया

जाता है।

पूर्ण विकसित कर्मठ मौन के उदर में मोमी ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं जिसके द्वारा मोम

का उत्पादन होता है।





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