मधुमक्खी पालन
हमारे देश की जनसंख्या का लगभग 70 प्रतिशत भाग गाँवों में निवास करता है और उनमें
से अधिकांश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपने जीविकोपार्जन हेतु कृषि पर निर्भर है।
पर्याप्त मात्रा में कृषि योग्य भूमि न होने के कारण ये लघु एवं सीमान्त किसान अपने जीवन यापन के लिए केवल
खेती पर ही निर्भर नहीं रह सकते हैं, उनके लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे कृषि के
साथ-साथ लघु एवं कुटीर उद्योगों को भी अपनायें।
किसान के पास जब खेती करने के लिए भूमि
उपलब्ध न हो तो कृषक मधुमक्खी पालन करके उन्नति के शिखर पर चढ़ सकता है। यदि कुछ बातों
का खास ध्यान रखा जाय तो बहुत ही कम खर्च में मधुमक्खी पालन करके तरक्की की जा सकती
है। हम जानते है कि मधु हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है और शुद्ध शहद की मॉग सम्पूर्ण भारत
में अच्छी खासी है और यह अच्छा रोजगार सिद्ध हो सकता है। इसके अतिरिक्त, देश की दिन-प्रतिदिन
बढ़ती हुई जनसंख्या बेरोजगारी को बढ़ाती जा रही है।
इस समस्या का एकमात्र समाधान यही है कि
ग्रामीण बेरोजगार युवक/युवतियाँ कृषि आधारित व्यवसायपरक उद्योगों में प्रशिक्षण प्राप्त कर इसे
अपनायें।
पशुपालन, कुक्कुट पालन, रेशम कीट-पालन, मधुमक्खी पालन, मछली पालन, मशरूम
उत्पादन आदि प्रमुख व्यवसाय है जिन्हें कृषि के साथ-साथ किया जा सकता है ये व्यवसाय एक प्रकार
से कृषि के पूरक व्यवसाय है।
दिसम्बर से जुलाई तक शहद का संग्रह अधिक
होता है। नवम्बर से फरवरी तक मौन को सरसों के फसल से परागण इकट्ठा होता है उसके बाद
सहजन फिर लीची और सूरज मुखी के फूल से उन्हे परागण प्राप्त होता है। मधुमक्ख्यिा नर फूल से
परागण को इकट्ठा कर अपने घर ले जाती है। जिससे कि मौन परिवार बढ़ता है साथ में फसल में
25-30 प्रतिशत तक की वृद्धि भी होती है।
मधुमक्खी पालन एक ऐसा व्यवसाय है, जिसमें अपेक्षाकृत कम धन, कम श्रम और कम स्थान
पर भी किया जा सकता है। मधुमक्खी पालन से उत्पादकों को शहद, मोम, रायल जेली, गोद, मधुमक्खी
विष, मधुमक्खी वंश तो प्राप्त होता ही है, साथ ही मधुमक्खियों के माध्यम से अधिक अच्छे पर-परागण के कारण तिलहन, दलहन,फल तथा बीजोत्पादन हेतु उगाई गई सब्जियों आदि में 10-20 प्रतिशत अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है।
पर -परागित फसलों में कुल कीट परागण का 80 प्रतिशत केवल मधुमक्खियों के द्वारा ही सम्पन्न होता है । इस प्रकार फूल जहाँ मधुमक्खियों को उनके भोजन का मुख्य मधुमक्खी पालन
स्रोत पुष्प रस (मकरन्द) या पराग देते है, वही मधुमक्खियाँ पौधों के परागण में योगदान करके उनके
फल एवं बीज बनने में सहायक सिद्ध होती है।
भारत देश में आधुनिक मौन पालन की शुरूआत अंग्रेजो ने ही किया जिसमें सर्वाधिक
उल्लेखनीय व्यक्ति पादरी एल०बी० न्यूटन थे। उन्होंने 1911 से मौन पालन का कार्य शुरू किया तथा
अपने अनुभव से 1916 में भारत के कृषि विभाग की पत्रिका में लेख प्रकाशित किये।
सन् 1938
में उत्तर प्रदेश की सरकार ने जिला नैनीताल के ज्यूलीकोट नामक स्थान पर मधुमक्खी पालन का
एक शिक्षा केन्द्र स्थापित किया। इस केन्द्र के संचालक श्री राजेन्द्र नाथ मुटू ने अपने अथक प्रयासो
से 1937 में अखिल भारतीय मौन पालन संघ की स्थापना व 1939 में इंडियन बी जरनल नामक
पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ हुआ।
देश में 55,29,000 किग्रा० शहद का उत्पादन और औसत शहद का उत्पादन 13.5
किया०/मौनवंश/वर्ष है। मधुमक्खी पालन में प्रथम क्रान्तिकारी खोज मौनों के जीवन चक्र की थी,
सन् 1856 में लुइस मेन्डेज डी टोरेस ने पहली बार रानी मौन और अण्डे देने के बारे में बताया।
सन 1609 में चार्ल्स बटलर ने बताया कि ड्रोन नर मधुमक्खी है। 1636 में रिचर्ड रेमनैन्ट ने बताया
कि श्रमिक मौन मादा होती है। सन् 1851 में अमेरिकन लोरेन्जो लैगसट्राथ ने चलाय मान छत्ता फ्रेम
को तैयार किया।
भारत में मानक/चलायमान छत्ता फ्रेम को मिस्टर जान डगलस ने कलकत्ता में बनाया, जो
दूरसंचार विभाग में कार्यरत थे और उन्होंने ही 1884 में "। हैण्ड बुक ऑन बी कीपिंग इन इण्डिया"
नामक किताब का प्रकाशन किया। प्रथम मौन पालक एसोसिएशन भारत में 1909 में शिमला में बनाया
गया और ले० एफ०एस०कजिन मौन विशेषज्ञ नियुक्त किये गये।
अब योजना आयोग द्वारा इस व्यवसाय का विकास कार्य अखिल भारतीय खादी एवं ग्रामोद्योग
आयोग को सौंप दिया गया उसी की देख-रेख में इस व्यवसाय को विकसित करने का प्रयत्न किया
जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में मौन पालन सम्बन्धी प्रशिक्षण एवं प्रसार के क्षेत्र में व्यापक कार्यक्रम चलाये जा
रहे हैं। खासकर पर्वतीय जिलों में तो यह एक विकसित उद्योग का रूप ले चुका है। क्योंकि यहाँ की
जलवायु और उपलब्ध फूल वाली वनस्पतियाँ मौन पालन के लिए देश में सबसे ज्यादा उपयुक्त।
मधुमक्खी पालन का भविष्य
भारत में मधुमक्खी पालन एक लघु उद्योग के रूप में विकसित किया जा सकता है और इसे
बहुत आगे तक बढ़ाया जा सकता है। जो न केवल पोषण हेतु वरन बेकारी दूर करने में भी सहायक
होगा।
भारत में मधुमक्खी पालन
शुद्ध शहद की प्राप्ति के लिए वैज्ञानिक एवं अहिंसक तरीके से मथुमक्खियों का पालन करना
ही मधुमक्खी पालन उद्योग है। मधुमक्खी पालन उन्ही स्थानों पर किया जाता है जहाँ पर मथुमक्खियों
को पराग एवं मकरंद देने वाले पुष्प पीर्थों की संख्या अधिक हो। यदि वर्ष भर किसी न किसी प्रकार
के फूलों से पराग व मकरंद कम या अधिक मात्रा में मिलता रहें तो, ऐसे स्थान मधुमक्खी पालन के
लिए उपयुक्त है।
जिस मौसम में फूल अधिक होते हैं उस मौसम में रानी मौन अण्डे देना प्रारम्भ करती
है, जिससे मक्खियाँ अधिक संख्या में हो जाती हैं। सितम्बर से नवम्बर तक और फरवरी से मई तक
पौधों में फूल अधिक आते हैं, उसी समय नये मौन पालको को मधुमक्खी पालन का काम शुरू करना
चाहिए।
मौन वंशों का निरीक्षण करते हुए मौन पालक
मौन पालन से लाभ
- मौन पालन घर के सभी सदस्यों को रोजगार का अवसर प्रदान करता है।
- मौन पालन कृषि आधारीय व्यवसाय में अन्य व्यवसाय की अपेक्षा में ज्यादा और तेज लाभ
- देती है।
- कृषि गतिविधि जिसमे अलग से भूमि की जरूरत नहीं पड़ती है।
- मौन पालन में, मौन प्रकृति के पराग और मकरन्द से शहद बनाती है जो मौन के न लेने
- से बेकार चला जाता है।
- कमजोर वर्ग के लिए यह एक द्वितीय उद्यम है जो आय में वृद्धि करता है।
- कम निवेश पर इस व्यवसाय को शुरू किया जा सकता है।
- निवेश के अनुपात में लाभ ज्यादा होता है क्योंकि कच्चा माल (पराग मकरन्द आदि) प्रकृति
- से स्वतन्त्र रूप से मिल जाता है।
- मौन पालन ग्रामीण समुदाय को आत्म निर्भर बनाता है।
- मौन पालन क्षेत्रीय आर्थिक स्थिति में विविधता लाता
- मौन पालन राष्ट्रीय उत्पादकता में परागीकरण द्वारा अहम भूमिका निभाता है।
- घर के पिछवाड़े भी किया जाने वाला व्यवसाय है।
- राष्ट्रीय आय में योगदान देता है।

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