मधुमक्खियों का महत्व |Importance of honey bees

 मधुमक्खियों का महत्व

मधुमक्खियों से हमें अमृत तुल्य शहद मिलता है इसके अलावा मौनों द्वारा हमें मोम, पराग,

तथा मौनविष भी प्राप्त होते हैं, जिनका प्रयोग कई रूपों में होता है। लेकिन जिस लाभ को नजर अंदाज

किया जाता है, वह है मौनों द्वारा किया जाने वाला परागण कार्य।

यह देखा गया है कि, जहाँ भी मौन

पालन का कार्य होता रहता है वहाँ आस-पास के खेतों की उपज बढ़ जाती है। इसका कारण मौनों

द्वारा भरपूर परागण का होना रहता है।


जिन फूलों में पुंकेसर और स्त्रीकेसर दोनो होते हैं उनमें हवा के द्वारा हिलने डुलने से परागण

की क्रिया स्वयं हो जाती है। लेकिन बहुत पौधे ऐसे होते हैं जिनमें एक ही पुष्प में पुंकेसर और स्त्रीकेसर

दोनो नहीं होते यानी नर पुष्प अलग तथा मादा पुष्प अलग।


लौकी, कद्रू, पपीता जैसे बहुत फूलों

में परागण कार्य कीड़े-मकोड़े और मधुमक्खियों द्वारा होता है। ये नन्हे जीव फूलों का रस चूसने एक

फूल से दूसरे फूल पर जाते हैं।


जब वे नर फूल में प्रवेश करते हैं तो बहुत सा परागण उनके शरीर,

टांगों और पंखों में लिपट जाता है। जब ये कीड़े और मधुमक्खियों मादा फूलों पर बैठती हैं तो यह

पराग स्त्रीकेसर के ऊपरी सिरे (वर्तिकाग्र) पर पहुँच जाता है। इस प्रकार परागण की क्रिया पूरी हो

जाती है।


मधुमक्खी परागीकरण से प्रभावित फसलों में मधुमक्खी परागीकरण से वंचित फसलों की अपेक्षा

25-30 प्रतिशत अधिक उत्पादन पाया गया। लीची का फूल मधुमक्खी के लिए बहुत उपयोगी है।

लीची में मधुमक्खी परागीकरण का अवलोकन करने से पाया गया है कि जिन फूलों को मधुमक्खी

द्वारा परागीकृत किया गया उनमें 86 प्रतिशत फल और जिन फूलों को मधुमक्खी परागीकरण से वंचित

किया गया, उससे सिर्फ 14 प्रतिशत फल बने।


प्याज की फसल के परागीकरण में मधुमक्खी का विशेष योगदान रहा है। प्याज के जिन फूलों

में मधुमक्खी द्वारा परागीकरण करवाया गया, उनमें औसत 93.3 प्रतिशत और प्रत्येक बीज कोष में

4.3 बीज बने।


मनुष्य के भोजन का 30 प्रतिशत मौनों से परागण किये गये पौधों से आता है। परपरागण वाली

फसलों को 1 हे० क्षेत्रफल को परागण करने के लिए 3-9 मौन वंश की आवश्यकता पड़ती है। प्याज

के परागण में 70 प्रतिशत परागण केवल मौन द्वारा होता है। अन्य फसलों की अपेक्षा प्याज के मकरंद

में 10 गुना ज्यादा पोटैशियम (3600-13000 पी.पी.एम.) प्राप्त होती है।


एक मधुमक्खी 5 करोड़ पराग दाने एक चक्कर में लाती है

एक मधुमक्खी 25-500 करोड़ फूल से प्रतिदिन पराग और शहद लाती है एक श्रमिक मधुमक्खी की उड़ने की गति 28 कि०मी०/बंटा होती है। परागण की परागण हेतु मौन वंश और सम्भावित उपज में वृद्धि


भारतीय परिस्थितियों में भी पर परागण विशेषतः मधुमक्खी परागण से होता है, और फसलों

की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए मधुमक्खियों के द्वारा परागण कराने की क्रिया बड़ी

महत्वपूर्ण है।


मौन विष-


मधुमक्खी में डंक और मौन विष उसकी रक्षा के लिए है। आम आदमी डंक से

काफी भयभीत रहते हैं लेकिन मधुमक्खी का डंक लगना अनेक रोगों के लिए दवा का काम करती

है। खासकर जोड़ों के दर्द, गठिया तथा चर्मरोग में डंक लगना फायदेमंद होता है। जो लोग मौन पालन

का कार्य करते हैं उन्हें इन रोगों के होने की सम्भावना काफी कम रहती है।

उनके शरीर की

प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है। जहाँ मौन विष एकत्र करने की विकसित तकनीकि उपलब्ध है वहाँ

मौन विष एकत्र करके दवायें और इंजेक्शन बनाये जा सकते हैं।


मधुमक्खी गोंद या प्रोपोलिस- मधुमक्खी की प्रजातियों में केवल यूरोपियन मौन ही ऐसी

है, जो मौनी गोंद या प्रोपोलिस एकत्र करती है। इस गोंद का उपयोग मौने, मौन पेटिका की दरारों

को भरने और फ्रेमों को मौन पेटी में सील करने के लिए करती है।

इस प्रोपोलिस में ऐसे रसायन

मौजूद होते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं।


मधु अवलेह या रॉयल जेली- रॉयल जेली अत्यन्त महत्वपूर्ण पदार्थ है जिसे कमेरी मौने

नावित करके किसी भी नवजात इल्ली (लार्वा) को खिलाकर उसे रानी मौन में बदल देती है। रॉयल

जेली अनेक विटामिनों खनिजों एवं औषधियों का खजाना है। मनुष्य में यह जैविक किया को ठीककर

रोगप्रतिरोधी शक्ति को बढ़ाता है तथा बुढ़ापे को पीछे ढकेलता है।


कमेरी अपने मुँह में एक पतला रस निकालती है जिसमें 2 विभिन्न ग्रन्थियों से, निकले पदार्थ

मिले होते हैं। एक पदार्थ रंगहीन, पानी की तरह होता है। जो सिर में स्थित हाइपोफेरेन्जियल ग्रन्थि

से तथा दूसरा दुधिया सफेद रंग का पदार्थ मैण्डीबूलर ग्रन्थि से निकलता है। बराबर अनुपात में मिले

इस पदार्थ को रायल जेली या रानी का आहार कहते हैं। इसको लगातार या अधिक खिलाने से इल्ली

रानी बन जाती है।


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