मधुमक्खियों की प्रजातियाँ | Species of bees
सारंग या भँवर (एपिस डार्सेटा)
यह ऊँचे वृक्षों की डालियों, ऊँचे मकानों, चट्टानों आदि में एक विशाल छत्ता बनाती हैं। छत्ता
करीब डेढ़ से पौने दो मीटर तक लम्बा तथा करीब पौने दो मीटर तक चौड़ा होता है। सारंग मधुमक्खी
का आकार अन्य मधुमक्खियों की अपेक्षा बड़ा होता है।
ये शहद भी अन्य मधुमक्खियों से अधिक एकत्र करती हैं। इनके एक छत्ते से एक बार में लगभग 30 से 40 किग्रा० तक शहद निकल आती है।
सारंग में शहद काफी मात्रा में निकलती है किन्तु इस शहद की गुणवत्ता, भारतीय मौन
(इण्डिका) की शहद की अपेक्षा कम होती है। बाजारों में निचुड़ा हुआ शहद बेचने वाले लोग
ज्यादातर इसी शहद को बेचते हैं।
चूकि यह शहद वैज्ञानिक ढंग से नहीं निकाला जाता है, शहद के साथ अण्डे-बच्चों को निचोड़ दिया जाता है जिससे
इसकी गुणवत्ता और खराब हो जाती है।
छोटी मधुमक्खी या पोतिंगा (एपिस फलोरिया)
इसे भुंगा या छोटी मधुमक्खी भी कहते हैं।
यह भी सांरग की ही तरह केवल एक छत्ता बनाती है। यह देश में लगभग हर जगह वृक्षों और झाड़ियों की डालों तथा घर और चट्टानों के उभरे स्थानों
पर रोशनी में अपना छत्ता बनाती हैं। यह सारंग की तरह अधिक ऊँचाई पर छत्ता नहीं बनाती हैं।
औषधीय दृष्टि से इसका शहद उत्तम माना जाता है।
भारतीय मौन या खैरा मधुमक्खी (एपिस सिराना इण्डिका)
इसका स्वभाव सभी मधुमक्खियों की अपेक्षा नम्र होता है। ये शहद भी ज्यादा देती हैं, प्रतिवर्ष
प्रति मौन वंश 10-15 किग्रा० तक शहद प्राप्त हो सकता है। इंडिका की दो नस्लें हैं एक पहाड़ी मधुमक्खियों की प्रजातियाँ
और दूसरी मैदानी। पहाड़ी इंडिका घोड़ी बड़ी होती हैं तथा इसका रंग गहरा काला होता है, जबकि
मैदानी थोड़ी सी छोटी तथा हल्के रंग की होती है।
मौन पालन हेतु उपयोगी किस्में मधुमक्खियों की उपरोक्त किस्मों में से
केवल दो किस्म की मधुमक्खियाँ ही लकड़ी को पेटियों में पाली जा सकती है।
- भारतीय मौन
- यूरोपियन मौन
इटैलियन मौन (मैलीफेरा) की लोकप्रियता के कारण
- यह आकार में बड़ी तथा इनकी जीभ लम्बी होती है। इससे फूलों का रस व पाराण एकत्र करने की क्षमता अधिक होती है।
- जहाँ भारतीय मौन (इंडिका) से प्रति मौनगह प्रतिवर्ष 10-12 किल्या० शहद ही मिलता
- है वहीं मैलीफेरा से करीब 30-50 किग्रा० शहद निकलता है।
- मैलीफेरा में घरछुट व बकछुट की आदत नहीं होती है।
- मैलीफेरा में वैक्समाध के आक्रमण के प्रति प्रतिरोधक क्षमता होती है।
- मैलीफेरा बहुत सीधी मौन होती हैं और इंडिका की अपेक्षा कम डेक मारती है।
एपिस मेलीफेरा भारत में 1962 में आई और इसको शहद बनाने वाली है। 30-40 किग्रा० शहद प्रति परिवार प्रतिवर्ष उत्पादन देती है।
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